खुली किताब की तरह…..!!!!

खुली किताब की तरह
किस्से कई, पन्ने कई, पहलू कई
तुम समझ सकते हो मुझे?
इतनी सी ही तो बात है
किताब को पढ़ने के लिए
देखना पड़ता है उसकी प्रस्तावना को
उसके लिखे जाने के पीछे के भाव को
नाज़ुक सी हूं भावुक सी हूं
पर प्रेम से संपन्न हूं
तुम जितना पढ़ोगे उतना ही डूबोगे
बस उस प्रेम की वास्तविकता को
जान गए अगर तुम,
तो पढ़ना सफल होगा।
©Dr. Sakshi Pal

Author:

be the part of the present

38 thoughts on “खुली किताब की तरह…..!!!!

  1. बहुत सुंदर।👍👌👌👌

    “कौन से लम्हे का हासिल हो तुम
    इसलिए बीती रहती हूँ मैं
    मैं तुम्हें हारता कैसे देखूँ
    इसलिए जीतती रहती हूँ मैं….!” A

    Liked by 4 people

      1. आपने कविता के आखिरी में अपना नाम गलत लिखा है
        बस नोटिस किया तो बता दिया 😅

        Liked by 2 people

  2. बहुत ही खूबसूरत।
    अंतिम पन्ना पलटनेवाले,
    निष्कर्ष की जल्दबाजी कैसी,
    खुली किताब की तरह जिंदगी,
    खोलकर रख दी तेरे सामने,
    पन्ने छोड़ छोड़ पढ़ने की
    तेरी ये कलाबाजी कैसी?
    व्यर्थ का ये दौड़ तेरा,
    मंजिल दूर निकल जायेगा,
    जबतक तुम प्रस्तावना नही पढ़ेगा,
    भला मुझे कैसे समझ पायेगा।

    Liked by 3 people

  3. “नाज़ुक सी हूं भावुक सी हूं

    पर प्रेम से संपन्न हूं

    तुम जितना पढ़ोगे उतना ही डूबोगे

    बस उस प्रेम की वास्तविकता को

    जान गए अगर तुम,

    तो पढ़ना सफल होगा।”

    क्या खूब कहा है 👌👌
    लाजवाब पंक्तियां।👌👌

    Liked by 3 people

  4. “तुम जितना पढ़ोगे उतना ही डूबोगे”

    बस इसी बात से डरता हूँ
    बंद किताब कर पास रखता हूँ

    Liked by 2 people

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