हां मैं जानती हूं सब…..!!!!

हां मैं जानती हूं सब,
पहचानती हूं सब,
बहला लो मन को,
उलझा लो तन को,
जरिए तो कई है,
पर उस पीड को,
उस आह को,
आज भी आराम ना मिला,
तुमने जतन भी कर लिए सब,
गहरी चोट खाए लगते हो,
इश्क की तुम जनाब,
तो क्यों जो खुद,
आज तक भर नहीं पाए,
दूसरों को देते हो वो ही सब,
कब तक उलझते रहोगे,
इस उलझने सुलझाने के चक्कर में,
अरे अब तक तुम पड़ोगे,
किसी ने तुम्हे खिलौना बनाया,
किसी को तुम खिलौना बनाओगे,
अरे दोस्त कब तक करोगे ये सब।
©Dr. Sakshi Pal

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be the part of the present

40 thoughts on “हां मैं जानती हूं सब…..!!!!

  1. ऐसा भी होता है क्या ?😢😔

    भला ऐसे प्रेम से तो भगवान बचाये….प्रेम करके लोग आगे बढ़ते है ..आसमान छूते है…एक दूसरे को हौसला देते …एक दूसरे की कमियां समझते ,उसमे सुधार लाते…मिलकर एक दूसरे के सपने पूरे करते ….जैसे मेरी सुब्बू कर रही अभी 😊 ❤

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      1. मेरी राधा तो पढाई में व्यस्त है…हमको बिलकुल भाव नहीं देती😊😂😂

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      2. तुम किस्मत वाली हो मित्र😊✌

        मेरी राधा तो इंस्टाग्राम चलाने को force करती…फेसबुक भी … ED शीरन के गाने सुनती…टिकटाक देखती मॉडर्न राधा है …😂😂

        हमको भी बाँसुरी बजाऊब नहीं आता …..गिटार कीबोर्ड पर expertise है बस😂😂

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  2. बहुत ही खूबसूरत कविता। जिसने हमे भी कुछ लिखने को प्रेरित किया। शायद आपको पसन्द आए।

    दुनियाँ की भीड़ में अल्हड़ थे,नादान थे,
    आसपास के लोग मेरी नादानियों से परेशान थे,
    उस अल्हड़ को पास बुलाया उसने,
    जिस खुशी से अनजान थे वो प्यार सिखाया उसने,
    हम सीखते रहे,वे सिखाते रहे,
    वे हंसते,हम मुस्कुराते रहे,
    उनका सानिध्य ऐसा,
    पतझड़ पर मधुमास जैसा,
    जेठ की दुपहरी जैसे चाँदनी,
    उनकी खिलखिलाहट जैसे रागिनी,
    प्रेम का उबाल था उनपर लुटाते रहे,
    धरती की प्यास,बन सावन मिटाते रहे,
    आंखों ने उनकी आखों में एक बार नही,
    कई बार देखा,
    प्यार करते थे,उन्हें रब जैसा,
    उनकी मुस्कुराहट में छल नही प्यार देखा,
    आज जो आँसूं,गम,मुस्कुराहट,यादें,
    दर्द या ज्ज्बाते हैं
    सब उन्ही की सौगातें है,
    जो इतना कुछ दिया उस रब के प्रेम को
    मजाक मत समझना,
    कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी,
    उन्हें बेवफा मत कहना,
    आज भी हम जहाँ जाते वहाँ
    वही खुशबू वही साँसे हैं,
    वे गए कहाँ? वे ख्वाबों में अब भी नित आते हैं,
    आखिर उच्छृंखल,अक्खड़पन से भरी जिंदगी,
    उस अल्हड़ को शांत बनाया उसने,
    क्या हुआ हमें खिलौना बनाया उसने,
    क्या हुआ हमें खिलौना बनाया उसने।
    !!!मधुसूदन!!!

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      1. साक्षी जी, समय मिले तो मेरा ब्लॉग भी आवश्य चेक कीजियेगा। अपने सह-कवियों से सुझाव अवं टिप्पणियां पाकर अपने लेखन में सुधार का प्रयास कर रहा हूँ।🙏

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