💕☔इश्क की बारिश ☔💕

तू हो ! जो,😊

तो कर दूं इश्क की बारिश तुझ पे,💕

के कह दू इस जमाने से ,

एक तेरा ही हक है अब मुझ पे ,

तेरी इठलाती सी वो चहक,

तेरी वो नटखट सी हंसी , 😁

यूं लुभाती जैसे मन खिल उठता ,🥳

के कर दू इश्क की बारिश तुझ पे ।💞💕

ओस की बूंदों में 💧, इन गहराती रातो में,🌃

कटे कई शीत , कटे कई सावन 🌨️⛈️🌧️

कडाके की ठंड ☃️और , बारिश मन भावन, ☔

सहेज प्रीत के इस पावन घर में ,💕

फिर आए राधा मधुसूदन , 🌺

तू हो ! जो,

तो कर दूं इश्क की बारिश तुझ पे,💕

के कह दू इस जमाने से ,

एक तेरा ही हक है अब मुझ पे ,

के कर दू इश्क की बारिश तुझ पे ।💞☔☔

————–साक्षी पाल 💞🌺

☔😊🌺🙏

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27 thoughts on “💕☔इश्क की बारिश ☔💕

  1. बहुत सुन्दर इस कडकती ठण्ड मे इश्क से ही थाहौ मिल सकती है। बहुत सुन्दर

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  2. प्रेम से ओतप्रोत उम्दा कविता। लाजवाब।👌👌
    उपवन में तुम,तू ही मन मे,दिल में तूँ ही रोम रोम में,
    खुली नयन के सम्मुख तूँ ही,तूँ ही बंद पलक,दर्पण में,
    कदम बढ़े अरमान तुम्ही अब,
    जीवन मेरा जान तुम्ही अब,
    तूँ कान्हा मैं राधा जैसी,आ तुझपर मैं जान लुटाऊँ,
    अधरों पर अपने रख लेना,आ तेरी मुरली बन जाऊँ।

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  3. Bahut sundar …. दोस्त
    Kal piyush mishra ji ko padh rahe the unka he likha चेप रहे😍😂
    कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया…

    वो काम भला क्या काम हुआ
    जिस काम का बोझा सर पे हो
    वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
    जिस इश्क़ का चर्चा घर पे हो…

    वो काम भला क्या काम हुआ
    जो मटर सरीखा हल्का हो
    वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
    जिसमें ना दूर तहलका हो…

    वो काम भला क्या काम हुआ
    जिसमें ना जान रगड़ती हो
    वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
    जिसमें ना बात बिगड़ती हो…

    वो काम भला क्या काम हुआ
    जिसमें साला दिल रो जाए
    वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
    जो आसानी से हो जाए…

    वो काम भला क्या काम हुआ
    जो मज़ा नहीं दे व्हिस्की का
    वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
    जिसमें ना मौक़ा सिसकी का…

    वो काम भला क्या काम हुआ
    जिसकी ना शक्ल इबादत हो
    वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
    जिसकी दरकार इजाज़त हो…

    वो काम भला क्या काम हुआ
    जो कहे ‘घूम और ठग ले बे’
    वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
    जो कहे ‘चूम और भग ले बे’…

    वो काम भला क्या काम हुआ
    कि मज़दूरी का धोखा हो
    वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
    जो मजबूरी का मौक़ा हो…

    वो काम भला क्या काम हुआ
    जिसमें ना ठसक सिकंदर की
    वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
    जिसमें ना ठरक हो अंदर की…

    वो काम भला क्या काम हुआ
    जो कड़वी घूंट सरीखा हो
    वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
    जिसमें सब कुछ ही मीठा हो…

    वो काम भला क्या काम हुआ
    जो लब की मुस्कां खोता हो
    वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
    जो सबकी सुन के होता हो…

    वो काम भला क्या काम हुआ
    जो ‘वातानुकूलित’ हो बस
    वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
    जो ‘हांफ के कर दे चित’ बस…

    वो काम भला क्या काम हुआ
    जिसमें ना ढेर पसीना हो
    वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
    जो ना भीगा ना झीना हो…

    वो काम भला क्या काम हुआ
    जिसमें ना लहू महकता हो
    वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
    जो इक चुम्बन में थकता हो…

    वो काम भला क्या काम हुआ
    जिसमें अमरीका बाप बने
    वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
    जो वियतनाम का शाप बने…

    वो काम भला क्या काम हुआ
    जो बिन लादेन को भा जाए
    वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
    जो चबा…’मुशर्रफ’ खा जाए…

    वो काम भला क्या काम हुआ
    जिसमें संसद की रंगरलियां
    वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
    जो रंगे गोधरा की गलियां…

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  4. बारिश तो पसंद नहीं मुझे लेकिन आपकी पंक्तियों में सच कहूँ तो एक अलग ही एहसास है।
    धड़कन तेज कर दिया है इसने….पता नहीं क्यों रात का असर है या फिर शब्दों का कोई जादू।
    बस इतना ही कहना है
    ‘जब तुम पास होती हो
    तो महक उठती है ये साँसें
    जब तुम दूर होती हो
    तो बरस जाती है ये आँखें’

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